पानीपत का द्वितीय युद्ध / Second Battle of Panipat
इतिहास में पानीपत एक युद्धस्थल के रूप में जाना जाता था। वर्तमान में इनकी स्मृतियां ही पानीपत की पहचान है। यहां लड़े गए तीन युद्ध भारतीय राजनीति और शासन तंत्र में आमूलचूल बदलाव का कारण बने।
पानीपत की दूसरी लड़ाई 5 नवंबर 1556 को अफगान बादशाह आदिलशाह सूर के सेनापति और मंत्री हेमू और अकबर के बीच हुई। हेमू के पास अकबर से कहीं अधिक बड़ी सेना तथा 1,500 हाथी थे। प्रारंभ में मुगल सेना के मुकाबले में हेमू को सफलता प्राप्त हुई, लेकिन दुर्भाग्य से एक तीर हेमू की आंख में घुस गया और उसने युद्ध का पासा पलट दिया। बाद में हेमू को गिरफ्तार कर उसकी हत्या कर दी गई ।
पानीपत की दूसरी लड़ाई के फलस्वरूप दिल्ली और आगरा अकबर के अधिकार में आ गये। इस लड़ाई के बाद दिल्ली के तख्त के लिए मुगलों और अफगानों के बीच चलने वाला संघर्ष समाप्त हो गया और दिल्ली पर मुगलों का कब्जा हो गया और अगले तीन सौ वषों तक बरकरार रहा।
पानीपत का पहला युद्ध 21 अप्रैल 1526 को लड़ा गया था। इस युद्ध ने उत्तर भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रखी। इस लड़ाई में पहली बार बारूदी आग्नेयास्त्रों और मैदानी तोपखाने का प्रयोग किया गया था। सन 1526 में काबुल के तैमूरी शासक जहीर उद्दीन मोहम्मद बाबर की सेना ने दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी की सेना को युद्ध में परास्त किया।
एक अनुमान के मुताबिक बाबर की सेना में 15000 के करीब सैनिक और 20-24 मैदानी तोपें थीं। लोदी का सेनाबल 130000 के आसपास था, जबकि लड़ाकू सैनिकों की संख्या कुल 100000 से 110000 के आसपास थी, इसके साथ कम से कम 300 हाथियों ने भी युद्ध में भाग लिया था।